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मन और आत्मा

Pramod Mehta, March 1, 2023March 28, 2023

“Mind & Soul”

मानव मस्तिष्क में दो प्रकार से विचार उत्पन्न होते है पहला ‘मन’ के विचार दूसरा आत्मा के विचार । वृहद रूप से देखा जाये तो ‘मन’ (mind) अच्छा, बुरा, ऊँच, नीच, उचित एवं अनुचित आदि सभी तरह की प्रकृति का स्वरूप है परंतु आत्मा या अंतःकरण सदैव उचित प्रकृति का ही स्वरूप है । अधिकतर जब मन कुछ गलत की ओर प्रवृत होता है तो आत्मा के विचार उचित समाधान की ओर अग्रसर होते है। यहीं पर मन एवं आत्मा की सोच में अंतर का पता चलता है। शरीर की जागृत अवस्था में मानव का मन हमेशा क्रियाशील रहता है और जैसे ही मन में कोई अंतर्द्वंद्व प्रारम्भ होता है तो आत्मा की सोच भी साथ-साथ प्रारंभ हो जाती है। चूंकि मन के विचार  आत्मा के विचार से ज्यादा प्रबल होते है अतः मन शरीर व इंद्रियों का साथ देता है इसलिए व्यक्ति अधिकतर मन के अनुसार कार्य करता है और असफलता की स्थिति में मन यह विचार करता है कि, में ने आत्मा के विचार को प्राथमिकता क्यों नहीं दी। मन एवं आत्मा की इन विशेषताओं के कारण उनकी अहमियत मालूम पढ़ती । इस लेख में मन एवं आत्मा की प्रकृति को हाथ की चार उंगलियों, एक  अंगूठे एवं उनसे मिलकर बनी मुट्ठी से समझा जा सकता है ।

मन लालसाओं की नाव, आत्मा पतवार : मन(mind) इच्छाओं को उत्पन्न करता है और इंद्रियाँ उनका प्रवेश द्वार है । जैसे ही इंद्रियों ने किसी जीव या वस्तु को देखा, सुना या महसूस किया तो मन में तुरंत उनको जानने की लालसा ललक उठती है और उस जीव या वस्तु के संबंध में विश्लेषण प्रारम्भ हो जाता है कि, अमुक जीव या वस्तु को क्या वह पा सकता है । जिस क्षण मानव जीव या वस्तु को प्राप्ति के प्रयास के संबंध में सोचता है तो आत्मा भी वहाँ पर तुरंत प्रगट होकर व्यक्ति को समझाती है कि, अमुक वस्तु या जीव को प्राप्त करना व्यक्ति के लिये हितकर है या नहीं परंतु मन अपने हित को ध्यान में न रखकर छदम सुख की ज्यादा चाहत रखता है, चूंकि मन इंद्रियों का मित्र है अतः वह अधिकांशतः इंद्रियों के पक्ष में निर्णय करता है और कभी-कभी लालसाओं की नाव डूबने का भय बना रहता परंतु पतवार रूपी आत्मा मन की लालसा की नाव को किनारे लगाने का कार्य कर सकती है।          

मन कर्म है, आत्मा धर्म है : कर्म करना जीवन का सबसे प्रमुख कार्य है और जो भी कर्म व्यक्ति करता है वह सब मन से प्रेरित हैं क्योंकि कोई भी कर्म मन की स्वीकृति के बिना संभव नहीं है, इसलिये कहा जाता है कि बिना मर्जी के कोई काम नहीं हो सकता है। मन कर्म का क्रियान्वयन करता है चाहे वह अच्छा हो या गलत और आत्मा हमेशा इस क्रियान्वयन पर नज़र रखती है एवं जैसे ही कुछ गलत होने लगता है तो आत्मा का अलार्म बजने लगता है जो मन को चेतावनी देता है, रुको यह कार्य उचित नहीं है, अर्थात अधर्म होने को रोकना ही आत्मा का कार्य है इसलिये आत्मा धर्म है क्योंकि धर्म कभी भी गलत रास्ते की राह नहीं दिखाएगा ।

मन स्वार्थी, आत्मा निरंजन : व्यक्ति को सुख एवं दुःख का अनुभव मन करवाता है क्योंकि मन स्वार्थी है अतः वह हमेशा शरीर के पक्ष में निर्णय की चाहत रखता है और जब उसके पक्ष में कार्य नहीं होता है तो विपरीत परिस्थिति उत्पन्न होती है । सरल भाषा में मन के पक्ष में कर्म है तो यह उसका सुख है अन्यथा इसके विपरीत होना दुःख । चूंकि आत्मा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है अतः वहाँ पर सुख-दुःख की कोई जगह नहीं है। आत्मा की विचारधारा व्यक्ति के हित में ही होती है तो अच्छे-बुरे का कोई प्रश्न ही नहीं है वैसे भी आत्मा कभी भी व्यक्ति अनुचित की ओर नहीं ले जाती है तो फिर दुःख का प्रश्न नहीं और जब दुःख का प्रश्न नहीं तो सुख भी नहीं क्योंकि सुख-दुःख समानांतर चलते हैं।   

मन चंचल, आत्मा स्थिर : मन (mind) की अपनी एक विशेषता है उसका चंचल होना क्योंकि मनुष्य एक ही है परंतु मन के कारण विचारधारा बदलती रहती जिसका मुख्य कारण संसार में विविधता का होना और इस विविधता के फेर में जब मन पड़ता है तो वह चंचल प्रकृति में पहुँचकर व्यक्ति से कुछ भी कर्म करवाने में समर्थ हो जाता है। दिन पर दिन इतनी विविधता होती जा रही है कि, मन को नियंत्रित करना सरल नहीं है परंतु स्थिरता की परिचायक आत्मा मन को नियंत्रण करने में बिल्कुल सक्षम है बस आवश्यकता इस बात की है कि आत्मा की शक्ति से प्रभावित हो  कर कर्म करें।

मन अतृप्त, आत्मा संतोषी : मन (mind) हमेशा अतृप्त रहता है क्योंकि व्यक्ति की इच्छाएं कभी समाप्त नहीं होती हैं और इन अभिलाषाओं को पूर्ण करने के लिये मन हमेशा प्रयासरत रहता है, कभी-कभी उसके यह प्रयास सफल नहीं होते हैं तो व्यक्ति आपराधिक प्रवृत्ति का हो जाता। अतः मन मानव को राजा से रंक भी बना सकता है परंतु आत्मा में संतोष होने का विशेष गुण होता है क्योंकि जब-जब आत्मा की सोच से कार्य निष्पादन होता है तो सफलता की पूर्ण संभावना रहती है और व्यक्ति को संतोष रूपी आनंद प्राप्त होता है जो आगे चलकर परमात्मा की प्राप्ति का कारक बन जाता है। मन को परमात्मा के समीप ले जाने के लिये आत्मा के विचार के सोपान में यात्रा अति आवश्यक है तभी मन तृप्त हो पायेगा।

मन(mind) की ऊपर उल्लिखित पाँच परिस्थितियों  (लालसायेँ, कर्म, स्वार्थी, चंचलता एवं अतृप्त) को नियंत्रण में रखने की योग्यता आत्मा की पांचों विशेषताओं (पतवार, धर्म, निरंजन, स्थिरता एवं संतोषी) की उंगलियों से निर्मित मुट्ठी में निहित है, क्योंकि बंद हो मुट्ठी तो लाख की और खुल गयी तो खाक की । जीवन के रथ में लगे मन के घोड़ों को काबू में रखने ले लिये आत्मा की लगान बहुत ज़रूरी जान पड़ती है, अन्यथा बेलगाम रथ कभी भी दुर्घटना ग्रस्त हो सकता है। आत्मा के विचारों को प्राथमिकता देना या अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना ही श्रेयस्कर है जो योग क्रिया से संभव है या इच्छा को किसी संभव परिवर्तित रूप में देखना ।

मन संघर्ष और संदेह का सागर है तो आत्मा शांत-स्वच्छ सरोवर है
मन इच्छाधारी स्वभाव है तो आत्मा अनुशासन का भाव है
मन थक हार सकता है परंतु आत्मा निरंतर प्रयास का पथ है
मन इंद्रियों का गुलाम है, आत्मा इन पर लगाम है
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Pramod Mehta

After extending my service of 37 years in the ‘New India Assurance’, I started my passion for writing on life management. In my opinion, a clear vision of life is much needed in today's scenario.
My style of writing is simple so that my readers get a clear understanding.

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About Pramod Mehta

From my experience, I observed that a clear vision of life is much needed among people around thus chose ‘Life management’ as the genre of my blog.

My love for our mother tongue makes me write in simple Hindi so that people may understand easily.


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