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आत्मविश्लेषण – एक सार्थक प्रयास

Pramod Mehta, February 11, 2023March 13, 2023

वर्तमान में बहुत प्रकार के विश्लेषण हो रहे हैं चाहे वह परिवार, समाज एवं राजनीति से संबंधित  हो। मीडिया पर तो इसकी सुनामी आ चुकी है। स्वयं को छोड़ दुनिया के सभी टॉपिक के बारे में विश्लेषण करना बहुत आसान है क्योंकि उसके परिणामों की हमें कतई परवाह नहीं है। परंतु ‘आत्मविश्लेषण’ करना एक कठिन एवं आवश्यक कदम है जो समय-समय पर होता रहे तो जीवन की गंगा में उफान नहीं आता बल्कि शांत होकर बहती रहती है। ‘आत्मविश्लेषण’ एक प्रकार का समुद्र मंथन है जिसमें से 14 कीमती वस्तुएँ निकली थीं इसी प्रकार से स्वयं का विश्लेषण एक प्रकार विनियोग है जिसमें से कई कीमती परिमाण सामने आते हैं वे जीवन के लिये संजीवनी बन जाते है। इन्ही कई परिणामों को समुद्र मंथन की  कुछ कीमती वस्तुओं से संबंध बनाया गया है।   

विष – समुद्र मंथन से हलाहल विष निकला था जो हमें यह संदेश देता है कि, आत्ममंथन करके यह ज्ञात करें कि स्वयं में किस-किस प्रकार के बुराई रूपी विष मौजूद हैं और इनका प्रभाव कैसे समाप्त किया जा  सकता है क्योंकि विष किसी भी रूप में हो हानिकारक तो है ही। मुख्य रूप से   हमारे में यह विष वाणी, सोच व खान-पान में पाया जाता है। वाणी का विष जब बाहर आता है तो वह दूसरों के लिये हानिकारक होने के साथ ही साथ स्वयं के लिये भी घातक हो जाता है। वाणी का विष सोच के चूल्हे पर खान-पान की कड़ाही में पकता है इसलिये सबसे पहले ‘शुद्ध आहार शाकाहार’ के  सिद्धांत का पालन करें क्योंकि कहावत है ‘जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन’ और जब मन साफ होगा तो वाणी भी अपने आप विष रहित हो जायेगी।

कामधेनु गाय – समुद्र मंथन से यह महत्वपूर्ण वस्तु निकली थी जिसमें दैवीय शक्तियाँ थीं और जिसके दर्शन मात्र से ही दुःख व पीड़ा दूर हो जाती थी। स्वयं के विश्लेषण/मंथन करने पर  अपनी शक्तियों से साक्षात्कार होगा, मेरी किस क्षेत्र में कितनी क्षमता है, स्वभाव कैसा है, में समाज के किस कल्याणकारी कार्य हेतु उपयुक्त हूँ, क्या लोग गौमाता जैसा भरोसा मुझ पर कर पायेंगे । यह एक ऐसा मंथन है जो हमको आम लोगों में विशिष्ट बना सकता है।

कोस्तुभ मणि – समुद्र मंथन में एक वस्तु यह भी निकली थी जिसका प्रमुख गुण था कि, जहां यह मणि होती है, वहाँ किसी भी प्रकार की दैवीय आपदा नहीं होती हैl स्वयं के मंथन से यह भी ज्ञात हो सकता है हम किसी के लिये परेशानी/समस्या कारक तो नहीं हैं और क्या स्वयं इस योग्य हैं कि, दूसरों की आपदा को दूर करने में सहयोगी बन पायेंगे?, क्या अन्य लोग हमारी संगत पसंद करेंगे ? इस विश्लेषण/मंथन से हमारी कमजोरियाँ और खूबियाँ उजागर हो जाती हैं।

मदिरा – समुद्र मंथन के दौरान वारूणी/मदिरा प्रकट हुई जिसको देत्यों ने प्राप्त किया। स्वयं के विश्लेषण/मंथन से यह मालूम पड़ जाता है कि, हम किस श्रेणी के हकदार है अर्थात देव हैं या दानव । हमको हमारी श्रेणी के अनुसार ही वस्तु प्राप्त होगी और देव बनें या दानव यह हम पर निर्भर करता है।

पारिजात वृक्ष – समुद्र मंथन से निकले इस वृक्ष की विशेषता यह थी कि इसे छूने से ही थकान मिट जाती थीl जब स्वयं का मंथन करें तो यह भी देखें की हम अपने परिवार के कितने काम आ सकते हैं क्या हम अपने बुजुर्गों की थकान दूर करने लायक है। हमारा प्रयास यह हो कि, हम भी परिवार एवं समाज के लिये पारिजात वृक्ष बनें।

पांचजन्य शंख – समुद्र मंथन के दौरान “पांचजन्य शंख” प्रकट हुआ जिसको विजय का प्रतीक एवं इसकी ध्वनि को बहुत ही शुभ माना गया है । आत्म मंथन करके हम अपने दोषों को दूर कर जीवन को सफल कर सकेंगे और हमारे में शंख के समान गुण आ पायेंगे ।  हमारी वाणी स्वयं के साथ-साथ दूसरों को भी कर्णप्रिय एवं लाभकारी होगी। स्व-विश्लेषण का यह एक प्रमुख परिणाम है क्योंकि मुख से निकली ध्वनि (वाणी) का हमारे जीवन की सफलता में अधिकतम योगदान है।  

ऐरावत हाथी – समुद्र मंथन से हाथी भी निकला था जो अपने दिव्य गुणों के लिये जाना जाता है। स्वयं के मंथन से यह पता लगता है कि, हम में भी इस हाथी समान गुण है या नहीं, क्या हम इसकी तरह समझदार  एवं उपयोगी प्राणी हैं ?, क्या हम किसी के लिये बोझ तो नहीं ?

कल्पवृक्ष – समुद्र मंथन के दौरान कल्पवृक्ष भी प्रकट हुआ था जिसकी विशेषता थी कि वह सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाला वृक्ष थाl स्व-विश्लेषण/मंथन करके हम कल्पवृक्ष के समान उदार हृदय वाली प्रतिभा बनने की शक्ति भी प्राप्त कर सकते हैं जो न केवल हमारी दुविधायें दूर करती है, बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से सक्षम बना सकती है। मंथन करते समय नकारात्मकता को हावी नहीं होने दें क्योंकि कभी-कभी सोचा हुआ भी सच हो जाता है।  

अमृत – समुद्र मंथन के दौरान प्रकट होने वाला अंतिम रत्न “अमृत” था जिसके कारण देवों एवं दानवों में युद्ध हुआ था । आत्म मंथन से भी अमृत रूपी प्रतिभा सामने आ सकती है जिसको निखार कर हम ऐसे कार्य करें कि, अपना नाम दुनिया में अमर हो जाये क्योंकि शरीर समाप्त होने के बाद भी नाम अमर रहता है।   

विश्लेषण/मंथन करते समय यह ध्यान देने योग्य तथ्य – पूर्वाग्रह से ग्रसित न हों, हम स्वयं भी गलत हो सकते हैं, यह ज़रूरी नहीं कि में अच्छा हूँ तो सभी अच्छे हों, मेरे में भी कुछ कमियाँ हैं, सभी अपनी-अपनी जगह सही हैं, परिस्थितियाँ अलग-अलग हो सकती हैं, अकेला मेरा हित ही नहीं है और भी हैं आदि-आदि।    

मंथन एवं विश्लेषण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका निरंतर होना बहुत ज़रूरी है जैसे समुद्र मंथन से 14 बेश-कीमती वस्तुएं निकली, जैसे दही को मथो तो माखन और घी निकलता है ठीक इसी तरह आत्म मंथन/विश्लेषण से बहुत कीमती एवं उपयोगी विचारधारा निकल आती है। लगभग सभी धर्मों के संत यही कहते हैं कि, स्वयं में झाँको यही पर सब कुछ है, हिरण की तरह कस्तूरी मत तलाशो वह तो उसके शरीर में ही है। चूंकि आज व्यक्ति के पास समय नहीं है इसलिये वह मंथन की प्रक्रिया से दूर है और यही दूरी उसको दुविधा की और धकेल रही है। यहाँ पर एक कहावत  बहुत उपयुक्त है “ईलाज़ से बचाव अच्छा” क्योंकि “सब कुछ लुटा के होंश में आये तो क्या हुआ”। आज बहुत से निर्णय बिना समुचित विश्लेषण/मंथन के हो रहे हैं जिससे पूरी मानव जाती संकट में है चाहे वह पर्यावरण, जनसंख्या, प्रकृति का दोहन आदि से संबंधित हो।  

विचारों का विश्लेषण करके, मंथन करेंगे मन का
विकारों का होगा विषहरण, विश्वास जीतेंगे जन जन का
मुख से निकलेगी शंख ध्वनि, चहक उठेगा तिनका तिनका
जीवन के समुद्र का मंथन से, मिल जायगा खुशियों का अमृत,
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Pramod Mehta

After extending my service of 37 years in the ‘New India Assurance’, I started my passion for writing on life management. In my opinion, a clear vision of life is much needed in today's scenario.
My style of writing is simple so that my readers get a clear understanding.

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About Pramod Mehta

From my experience, I observed that a clear vision of life is much needed among people around thus chose ‘Life management’ as the genre of my blog.

My love for our mother tongue makes me write in simple Hindi so that people may understand easily.


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