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रिश्तों का प्रशासन

Pramod Mehta, December 23, 2022March 13, 2023

व्यक्ति के जन्म से ही रिश्ते/संबंध प्रारम्भ हो जाते हैं और मृत्यु तक इनका साथ रहता है । रिश्तों का प्रारम्भ तो अच्छा होता है परंतु समय-समय पर आये परिवर्तनों के कारण इनमें उतार-चढ़ाव एवं रस्साकशी चलती रहती है। जीवन का एक बड़ा भाग तो रिश्तों को संभालने में ही खर्च हो जाता है फिर भी आशातीत सफलता  प्राप्त नहीं होती और मन हमेशा यह सोचता है ऐसा क्यों। कुछ असावधानियाँ अंजाने में होती हैं और कुछ जानबूझकर की जाती हैं और दोनों ही परिस्थितियों में तुरंत निदान अति आवश्यक है अन्यथा संबंध बट्ठर/पत्थर हो जाता है। रिश्तों की भी श्रेणी होती है और निकटता वाले रिश्तो में हमेशा आत्मा/दिल की सुनना उचित है । रिश्तों को प्राभावित करने वाले कई घटक हैं जिनको यदि प्रारम्भ से ही ध्यान नहीं दिया तो आगे जा कर वे गंभीर अवस्था में पहुँच जाते हैं जैसे बीमारी जिसका इलाज़ तुरंत नहीं किया गया तो वह भयानक रूप ले लेती है और व्यक्ति का अंत तक हो जाता है।

नकारात्मक सोच – रिश्तों को प्रभावित करने वाला यह विशेष घटक है क्योंकि कुछ भी होने पर लगभग प्रत्येक व्यक्ति विपरीत अर्थों में ही सोचता है। इस प्रकार सोचना कोई गलत नहीं है क्योंकि नकारात्मकता मस्तिष्क की एक स्वाभाविक क्रिया है जिस पर विजय पाना एक कठिन अध्ययन है, परंतु रिश्तों में इस सोच का मन पर अधिक देर तक हावी रहना अनुचित है। मेरा यह मानना है कि रिश्तों के बीच कोई भी घटना के पीछे गलत मंतव्य नहीं होता है यह तो अचानक परिस्थितियों के बदलाव से आया हुआ सैलाब है जो कुछ देर के लिये नुकसान पहुंचा सकता है हमेशा के लिये नहीं, यदि उसमें सकारात्मकता का भाव है तो। उदाहरण के लिये अभिभावकों एवं संतानों के रिश्ते में अक्सर सोच को लेकर टकराव की स्थिति बनती है यदि पिता सोच ले कि यह पीढ़ीगत अंतर है और पुत्र यह सोच ले कि पिता अनुभवी हैं उनकी सोच को नए युग के अनुसार बदलने का प्रयास किया जावे तो कभी मनभेद नहीं होगा।

अहं का भाव – यह ऐसा कारण है जो जिसका रिश्तों में कोई स्थान नहीं है परंतु यह बिन बुलाये मेहमान की तरह प्रवेश करता है और उनको बहुत क्षतिगृस्त कर देता है। रिश्तों की बुनियाद प्रेम एवं समर्पण की नींव पर टिकी होती है तो वहाँ अहं का क्या काम है। रिश्तों में “मे” के स्थान पर “हम” उपयोग करते हैं  तो वे चट्टान की तरह मजबूत रहेंगे अन्यथा रेत की तरह बिखर जाएँगे। जब-जब अपने आप को श्रेष्ठ प्रदर्श करने की चेष्ठा की जावेगी तब-तब ‘अहं’ की बुराई उत्पन्न होगी जो रिश्तों में खटाई पैदा कर देगी इसलिये रिश्तों में ‘अहं’ को ठीक उसी तरह माना जाता है जैसे हरे भरे वृक्ष की जड़ में मट्ठा/छाछ डालना।

शब्दों की व्याख्या – कहे गये शब्दों का अर्थ उसी ताल और लय में निकाला जाय जिस भावना से वे कहे गये हैं तो रिश्तों में हमेशा दृड्ता रहेगी । कभी-कभी दूसरे लोगों से कही सुनी बातों के आधार पर रिश्ते की एक छवि हमारे ज़ेहन में बन जाती है और अक्सर यह अनुभव किया गया है कि, उस रिश्ते में सुने गये शब्दों की व्याख्या हम अपने मन में विध्यमान उसकी छवि के अनुसार कर लेते हैं जबकि, ऐसा नहीं होना चाहिये। रिश्तों में कहे सुने गये शब्दों की व्याख्या को परिस्थिति के अनुसार सकारात्मक रूप से करना ही रिश्तों को बनाये रखना है क्योंकि यह ज़रूरी नहीं है कि,जो देखा एवं सुना गया है वह सच हो। श्री बी आर चोपड़ा की बनायी हुई वर्ष 1960 की हिन्दी फिल्म ‘कानून’ इसका स्पष्ट उदाहरण है जिसका सार है जो देखा एवं सुना गया हो ज़रूरी नहीं है कि, वह वास्तविक सत्य हो।

शब्दों का चयन – रिश्ते बहुत संवेदनशील होते हैं जिसमें प्रयोग किये जा रहे शब्दों का चयन भी बहुत सोच समझकर एवं सरलता से किया जाना अतिआवश्यक है क्योंकि लापरवाही पूर्वक किया गया वार्तालाप अच्छे से अच्छे रिश्तों को ज़मींदोज़ कर देता है। व्यक्ति एकेड़ेमिक शिक्षा तो गृहण कर लेता है परंतु व्यवहारिक शिक्षा से दूर रह जाता है जो कि, जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। इस संबंध मेरा सोच है कि स्कूल स्तर पर ही इस प्रकार की शिक्षा होनी चाहिये जो बच्चों को रिश्ते बनाये रखने में जिंदगी भर सहायक हो। अक्सर विभिन्न देशों के रिश्ते केवल शब्दों के चयन से बिगड़ एवं सुधार जाते हैं। शब्दों के चयन के लिए  ध्यान रखने योग्य बातें जैसे व्यक्ति का स्वभाव, उम्र, स्तर, रिश्ते की गरिमा, जेंडर, तत्कालिक मनःस्थिति आदि।

यथार्थता की बुनियाद – रिश्तों का आधार पूर्णरूप से वास्तविकता के धरातल पर होना भी आवश्यक है। ‘स्वार्थवाद’ की बुनियाद पर बने रिश्ते कभी न तो सफल होंगे न ही दीर्घकालिक होंगे या केवल व्यवसायिक होकर रह जायेंगे उनमें अपनत्व की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी एवं अधिकतर दिखावटी होंगे। ऐसे रिश्तों की पहचान करना थोड़ा कठिन है या कुछ समय पश्चयात ‘स्वार्थवाद’ मालूम पड़ता है।  

रिश्तों का प्रशासन करें प्रबंधन नहीं – प्रबंधन तर्क शक्ति पर कार्य करता है जबकि प्रशासन नियमों पर आधारित होता है। एक प्रबन्धक अपनी तर्क शक्ति के आधार पर अपने संस्थान का भला कर सकता है ज़रूरी नहीं है कि सबका भला हो परंतु एक प्रशासक को सबके हित को सोचकर नियमानुसार कार्य करता है। इसका सबसे सटीक उदाहरण – एक कंपनी का सीईओ और एक जिले का जिलाधीश। रिश्तों का प्रबंधन किया गया तो संभव है तर्क शक्ति के आधार पर एक बार आप सफल हो जायें परंतु जब वास्तविकता सामने आती है तो रिश्ता समाप्ति की ओर अग्रसर हो जाता है। जबकि, रिश्तों में प्रशासन होगा तो नियम से किये गये कार्य की सर्वत्र सराहना होगी और रिश्ते प्रगाढ़ होंगे।   

अर्थ / धन – रिश्तों को प्रभावित करने वाला यह सबसे प्रमुख कारक है। अर्थ की कमी और बेशी दोनों ही रिश्तों को प्रभावित करती है। रिश्तों में धन स्वयं कोई ऐसा कार्य नहीं करता जिससे रिश्ते प्रभावित हों, यह तो इसके उपयोग पर निर्भर है। धन की न्यूनता (व्यक्ति के पास आवश्यक आवश्यकता को पूर्ण करने लायक धन उपलभ्ध न होना) से व्यक्ति में हीन भावना आना लाज़िमी है और धन की अधिकता (विलासिता) श्रेष्ठता की भावना को जन्म दे सकती है एसी स्थिति रिश्तों में कड़वाहट लाती है। इसीलिए कहा जाता है धन को अपने पर हावी न होने दें क्योंकि धन कारक है कर्ता नहीं।

रिश्तों में गोपनियता – रिश्तों में आपस में कही गयी बातों में गोपनियता बरतना भी अति आवश्यक है । यह ऐसा तत्व है जो यदि विध्यमान है तो रिश्तों की गरिमा बनी रहेगी । सरल शब्दों में कहा जाय तो बातों को पेट में पचाना भी आवश्यक है । बहुत से वार्तालाप को सार्वजनिक करना रिश्तों के लिए दीमक समान है । कुछ लोगों को एक की बात दूसरे को बताने में आनंद की प्राप्ति तो होती है परंतु परिणाम भयानक हो सकते हैं। रिश्तों में गोपनियता रखने वाला व्यक्ति हमेशा आदरणीय स्थान प्राप्त करता है।

रिश्तों की खेती प्यार, पारदर्शिता, समर्पण, समन्वय एवं सम्मान से सिंची जाती है जिसमें से उत्साह, उमंग, उल्लास, निरोगी काया, यश-कीर्ति एवं प्रगति के मीठे फल उत्पन्न होते हैं। रिश्तों में हमारी मानसिकता “जाने भी दो यारों” वाली होना चाहिये क्योंकि मानव जन्म मिला है मुक्ति के लिए न कि जुगति (चालाकी) के लिये। रिश्तों को बनाए रखने का अचूक आधार है, ‘सहनशीलता’ जिससे हम हर रिश्ते को स्थायित्व प्रदान कर सकते है। इसमें तुनक मिज़ाजी का कोई स्थान नहीं है और न ही रिश्तों को आजमाने प्रयास करना चाहिये। रिश्तों के संबंध में एक कहावत बहुत उपयुक्त है ‘यदि वे अच्छे हैं तो वरदान और बुरे हैं तो अभिशाप’। रिश्ते अनमोल होते हैं क्योंकि जब समय आता है तो यही रिश्ते वो कर दिखाते हैं जिनकी उम्मीद हम ईश्वर से करते हैं।

अनूठा है ये रिश्तों का संसार, पराये भी हो जाते हैं यहाँ खास
लाले पड़ जाते है आँखों को दीदार, कानों वार्तालाप, जब रिश्ते हो ख़राब
रिश्तों में न खोजो धन का भंडार, वो तो हैं ईश्वर का अनमोल उपहार
नहीं बिगड़ेंगे रिश्ते हजार, यदि उनमें रहे हमेशा प्यार, प्यार और प्यार।
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Pramod Mehta

After extending my service of 37 years in the ‘New India Assurance’, I started my passion for writing on life management. In my opinion, a clear vision of life is much needed in today's scenario.
My style of writing is simple so that my readers get a clear understanding.

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From my experience, I observed that a clear vision of life is much needed among people around thus chose ‘Life management’ as the genre of my blog.

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